जिम के बाद का पहला दिन | हालत पस्त

"(दर्द भरी मुस्कुराहट के साथ) अरे भाईसाब !! लग रहा है कि अभी हाथ कंधे से टूट कर गिर जाएंगे, हालत पस्त हो गई भाई.." ये बोलते हुए मैं अपने रूममेट की तरफ देखे जा रहा था लेकिन फिर भी एक अलग ही खुशी थी।

अभी भी याद है मुझे शुक्रवार की वो सर्द शाम, पसीने से तर-बतर होने के बाद, शरीर की हर नसें जवाब दे रही थीं और सीढियों से उतरने में एक मीठा सा दर्द भी हो रहा था, क्योंकि.. आज जिम का पहला दिन था। पहली बार जिम गया मैं, ये जानते हुए भी की मुझ जैसे आलसी के लिए जिम बस कुछ ही दिन का शौक है लेकिन फिर भी एक उम्मीद थी कि क्या पता बिगड़ा रूटीन सही हो जाए और उम्मीद पर तो दुनिया कायम है। मेरे रूममेट कम भाई, विराज (काल्पनिक नाम) ने कुछ दिन पहले ही जिम जाना शुरू किया था। रोज एक फिक्स टाइम पर लोवर, टी-शर्ट और स्पोर्ट शूज़ में, बालों को थोड़ा भिगा कर जिम की तरफ कूच करना और वापस आकर थोड़ी देर आराम और फिर दिन भर में कई बार शीशे के सामने हल्की वाली खुद्दारी भरी मुस्कान के साथ कभी बाइसेप्स - कभी ट्राइसेप्स और कभी हाथों से टीशर्ट को पेट की तरफ खींच कर चेस्ट की चौड़ाई चैक करना कुछ प्रमुख क्रियाकलाप थे जो हर नवयुवक का एक सपना होता है। वो भले जिम में जाकर पसीने ना बहाए लेकिन शीशे के सामने आने पर सीने और पेट की ऊंचाई जरूर नापेगा। मैंने भी किशोरावस्था में कदम रखा था और बाकी युवकों जैसे ही शीशे के सामने वो 4 लोगों की बातो को याद करके चैक करता था कि कहीं मेरा पेट मेरी छाती से ज्यादा बाहर तो नही आ रहा (अगर बाहर है तो मेरी तोंद निकल रही और मैं मोटा हो रहा हूँ).. कहीं मेरे एक हाथ से दूसरो हाथ के बाजू व कलाई को पकड़ने पर मेरी उंगलियां अंगूठे को तो नहीं छू रहीं (अगर छूती है तों मैं दुबला हो रहा).. इन सब टेस्ट को रोज एक बार तो करना ही पड़ता है जिससे अगर कोई कहे कि, "अबे भाई ! तुम तो मोटे हो रहे हो, तोंद निकल रही है तुम्हारी.." तो मैं उसको फुल टू कॉन्फिडेन्स के साथ कह सकूँ कि नहीं यार, तोंद नही है भाई, खाते पीते घर की निशानी है.. और अभी तो पेट छाती से अन्दर ही है। खैर वो तारिख औऱ वो दिन आ ही गया जब मैने अपने आलसी मन और तेज तर्रार बनने का नाटक करने वाले दिमाग की लड़ाई को खत्म करके जिम जाने का निर्णय लिया। क्योंकि वो मौसम ऐसा था कि ना तो ढंग से ठण्डी पड़ रही थी और ना ही गर्मी... उस दिन संयोगवश विराज भी सुबह वाली शिफ्ट में जिम नही जा पाया था तो उसने शाम को जाने का निर्णय लिया, जिसने मेरे मन में जिम जाने की चिंगारी को थोड़ी और हवा मिल गयी और फिर तड़के ही मैं उसके साथ जिमखाने निकल गया। कुछ कारणों के चलते मुझे सजने-संवरने की कोई जरूरत थी नहीं थी क्योंकि एक तो मैं ज्यादा समय लोवर-टीशर्ट में ही रहता हूँ और दूसरा मुझे अपने शरीर के लिए आराम ज्यादा पसंद है जो की थोड़ा सा अस्त-व्यस्त रहने में ही लगता है। और फिर हुआ पहले दिन वाले जिम का खेल शुरू...  जिम में जिम के मालिक और सीसीटीवी कैमरे के बाद एक बंदा और होता है जिसके पास से आपको होकर ही गुजरना होता है। वो होता है, ट्रेनर... (ये आपके अन्दर के बॉडी बनाने के कीड़े को बहुत बड़ा भी बना सकता है और पल भर में मार भी सकता है। ये आप पर निर्भर करता है कि आपने इस कीड़े को अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से पैदा किया है या फिर किसी को देखकर बस यूं ही..) यहां का ट्रेनर मेरे दोस्त जैसा ही था क्योंकि मैं पहले उससे मिल चुका था और वो हमारे मोहल्ले में ही रहता था। खैर, मै विराज के साथ जिम में एक नये उत्साह के साथ पहुँचा। जेब से फोन और पर्स को निकालकर काउंटर के मेज पर रखते हुए मैंने विराज को देखा तो मैने भी ठीक वैसा ही किया, वहाँ और भी स्मार्टफोन्स वगैरह रखे थे तो चोरी वाली भी कोई बात नही थी। चाहे आप ट्रेनर की माने या ना लेकिन शुरू में तो आपको वार्म-अप ही करना ही होता है चाहे आप नये हों या पुराने, जिससे आपकी सारी नसें खुल सकें और वेट-लिफ्टिंग या अन्य एक्सर्साइज़ेस के समय नसें व मसल्स सर्प्राइज़ ना हों.. वार्म-अप के लिए आपके पास कई ऑप्शन होते हैंः साईकिलिंग, स्कीपिंग (रस्सीकूद), उछलकूद वगैरह। मुझे स्कीपिंग (रस्सीकूद) ज्यादा पसंद है तो मैने साईकिलिंग और स्कीपिंग (रस्सीकूद) चुना। तकरीबन 70-70 के तीन रिपीट्स स्कीपिंग और 10 मिनट की साईकिलिंग के बाद... माथे पर आने वाला पसीना, भौहों पर आ रहे पसीने से कहने लगा कि भाई, अब मजा आ रही थोड़ी-थोड़ी.. अच्छा जब आप पहली बार कुछ करते हैं तो उत्साहवश आप असीमित तरीके से उस काम को करते हैं और जब उस काम में मन भी लग रहा हो तब तो पूछिये ही मत... मैंने भी तकरीबन 15-20 मिनट की इस वार्म-अप नामक व्यायाम (तथाकथित एक्सर्साइज़) को करने के बाद ट्रेनर की ओर देखा और क्योंकि वो एक अन्य साथी को कुछ बाइसेप्स वर्काउट के तरीके बता रहा था तो मैं फिर धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ ही रहा था कि अचानक.... अरे-अरे संभलकर उठा भाई, नस खिंच जाएगी नहीं तो.. ये आवाज मेरे कानों में पड़ी जो पास में ही खड़े एक लड़के को देखते हुए ट्रेनर ने बोला क्योंकि वो बहुत वजनदार प्लेटें लगाकर उठाने जा रहा था। जिम में एक ऐसी भी प्रजाति मिलती है ना जो दुबली पतली काया के साथ ये सोचकर आते हैं कि भारी वजन से कम समय में बॉडी बनाई जा सकती है और बदले में शरीर टेढी मेढी होने का नुकसान भुगतना पड़ता है। फिलहाल मेरे केस में ऐसा कुछ नही था क्योंकि मुझे मेरी क्षमता और स्थिती का पता था और पहले दिन मैंने कार्डियो (बिना वजन उठाए शरीर के द्वारा ही किया जाने वाला व्यायाम) करने का ही निश्चय किया था। खैर वार्म-अप के बाद मैने ट्रेनर की मदद से 2 वर्काउट के 3 रिपीट्स किये जिसके बाद मेरा शरीर जवाब देने लगा लेकिन उत्साहवश जल्दी ही जाने का निश्चय लेना कौतूहल का विषय भी बन जाता (मेरे हिसाब से)। इसलिए 1 रिपीट और करने का निर्णय लेते हुए मैने अपने आप को समझाया की जब तक "नेवर गिव अप" का फंडा नही अपनाओगे तब तक बॉ़डी कहां से फिट होगी.. लोवर-टीशर्ट के लिए सुडौल जांघे (लेग्स) और  थोड़ी बाइसेप्स तो जरूरी हैं ना वो तो चाहिए ही। खैर 1ः15 घण्टे पसीना बहाने के बाद जब सीढिया उतरे तो .. भाईसाब !! हालत पस्त...

8 views0 comments

©2019 by Rishabh Pandey.