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  • ऋषभ पाण्डेय

मां : इनफिनिटी से भी ज्यादा प्यार करने वाली



मैंने बहुत कोशिश की पैसा कमाने वाले ब्लॉग लिखूं लेकिन कई लोगों ने साफ शब्दों में कहा कि "रहने दो भाई, तुम किसी विषयवस्तु को भावनात्मक दृष्टिकोण से व्यक्त करते हो आर्थिक दृष्टिकोण से मत सोचो! तुमसे ना हो पाएगा।"😊

ये पोस्ट मैं पूर्ण रूप से सभी माताओं को समर्पित करता हूँ, क्योंकि हमारे सृजन का मूल हमारे माता-पिता ही हैं और उन्ही के कारण हमें यह देंह प्राप्त है। आप सोच रहे होंगे कि फिर केवल माताओं को ही क्यों समर्पित कर रहा हूँ, क्योंकि पिता के लिए अगला लेख होगा।

यों तो ये दोनों ही शब्दों के व्याखानों से परे हैं। लेकिन हमने जो महसूस किया, जो अर्जित किया, वो सब तो लिख ही सकते हैं।

आज गुरू पूर्णिमा है, पूरे सोशल मीडिया पर सबने शुभकामनाएं और आशीर्वाद व्यक्त करते हुए अपने गुरुजनों से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए कई पोस्ट किए। बच्चा चाहे किसी अमीर परिवार का हो या किसी गरीब परिवार का, उसका पहला गुरु या शिक्षक उसकी मां ही होती है। बोलने के लिए पहले शब्द से लेकर चलने के लिए उठने वाले पहले कदम की सही शिक्षा देने वाली, साथ ही बच्चे के उस पाठ को सही तरीके से प्रयोग में लाने तक उसे बार-बार समझाने और बताने वाली 'शिक्षिका'।

मां अपने परिवार की आर्थिक हालतो को जानते और समझते हुए भी बच्चों को अच्छे से अच्छा खिलाने और पहनाने के लिए हमेशा ही प्रयत्नशील रहती है। उसके खुद के भूख को वह काटकर बच्चों के सामने हंसते हुए उनके भूख के लिए अपनी थाली की रोटी उनको दे देती है क्योंकि उसके लिए उनका पेट भरना ज्यादा जरूरी होता है और ऐसा हमारे जन्म से 9 माह पहले ही वह करना शुरू कर देती है। तब वह जो भी खाती है या उसकी जो भी खुराक होती है, उससे बनने वाले रक्त और पोषक तत्व से ही हम गर्भ में जीवन यापन कर पाते हैं। लेकिन आज के परिवेश को ध्यान में रखा जाए तो एक बात हजम नहीं हो पाती की,

जो मां हमारे लिए इतने कष्ट उठाती है,

हमें अपने हिस्से का खिलाती है।

खुद गीले बिस्तर की तरफ खिसक कर,

हमें सुखे बिस्तर पर सुलाती है।

रात रात भर जाग कर,

हमारी नींद के लिए अपनी नींद भगाती है।

उसके खुद के पैरों में तेज दर्द हो रहा हो,

लेकिन हमारी एक दर्द भरी कराह पर,

अपना दर्द भूल कर हमारे लिए दर्द निवारक घरेलू औषधियां लेकर हाजिर हो जाती है।

चाहे हाउसवाइफ हो या जॉब करने वाली,

सबके लिए बच्चे की जिम्मेदारी प्रायोरिटी पर ही आती है।

बच्चे ने खाना खाया, नहीं खाया! दवा खाई, नहीं खाई!

सेहत का ध्यान रख रहा, नहीं रख रहा!

इसी में उसकी दुनिया समाती है।

पति पुत्र ही दोनों आंखें,

वही हैं दोनों पाव समान,

चाहे सुख में चाहे दुख में उन्हीं को बस बिसराती है,

प्रेम क्षमा दृढ़ता की मूरत,

बनकर वो धरा पर आती है।

करती जब यह सारे तप तब,

नारी 'माता' कहलाती है।

उसे हम बड़ा होने के बाद यह कहने की हिम्मत कहां से लाते हैं कि "तुमने हमारे लिए अभी तक किया ही क्या है? बस पाल-पोस दिया, पढ़ा लिखा दिया, इतना ही ना !!"

कभी यह सोचा है की तुम्हारे इस एक लाइन के सवाल ने उसके कितने सालों के प्यार दुलार और समर्पण को एक क्षण में चकनाचूर कर दिया होगा, क्या बीती होगी उसके दिल पर जो कई बरस पहले यह सुनकर गदगद हुए होंगे कि "मुबारक हो !! आप मां बन गई और आपको बेटा हुआ है।"

देखो ऐसा है ना की हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि,

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।  मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्।।

(स्रोत: पद्म-पुराण)

अर्थात: माता सर्व तीर्थमयी और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप हैं इसलिए सभी प्रकार से यत्नपूर्वक माता-पिता का पूजन करना चाहिए। जो माता-पिता की प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपों से युक्त पृथ्वी की परिक्रमा हो जाती है। माता-पिता अपनी संतान के लिए जो क्लेश सहन करते हैं, उसके बदले पुत्र यदि सौ वर्ष माता-पिता की सेवा करे, तब भी वह इनसे उऋण नहीं हो सकता।

और भाईसाब ये कई लोगों का देखा-सुना अनुभव भी है।

हर रिश्ते मदर्स-डे, फादर्स-डे, फ्रैंडसिप डे पर पोस्ट डालने मात्र तक ही सीमित नहीं होने चाहिए, वो हर दिन उन लोगों के प्रति वास्तव में झलकने चाहिए, जो सही मायने में उसके हकदार हैं।

खूब प्यार लुटाइए लेकिन बस एक दिन के लिए नहीं ...


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