पिता – परिवार के खुशियों की चाभी


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शाम का समय हो गया, टिंकू ने सुबह से कुछ नहीं खाया, ये देखकर उसकी मां कुसुम बहुत ही परेशान, लेकिन बेचारी करे भी तो क्या करे। कल रात तो किसी तरह से अपने हिस्से का थोड़ा सा खाना आज सुबह के लिए रखकर उसने सुबह अपने बच्चे का पेट तो भर दिया लेकिन इस समय ना तो घर में कुछ खाने को था, ना ही उसके पास इतना पैसा की वो दुकान जाकर कुछ खाने के लिए खरीद कर ला सके। अब दोनों को इंतजार था तो बस दीनानाथ का जो नाइट शिफ्ट करने रात में भोजन करके निकलता था और सुबह आते समय पूरे दिन का राशन और सब्जी ले आता था, क्योंकि उसकी आमदनी भी बहुत ज्यादा नही थी।


आज पूरा दिन बीत जाने पर भी अभी तक दीनानाथ नही आया और उन दोनों की हालत बिगड़नी शुरू हो चुकी थी, क्योंकि घर का एकमात्र मुखिया पूरा दिन घर नही आया और टिंकू भी भूख से छटपटा रहा था क्योंकि था तो आखिर वो बच्चा ही। बेचारी कुसुम सोच-सोच कर परेशान हो रही थी की, क्या हुआ ? आखिर क्यों आज अभी तक उनका आना नहीं हुआ ? ऐसा क्या हुआ होगा ? वो तरह-तरह की कल्पनाएं कर रही थी कि अचानक, घर के दरवाजे पर किसी के आने की आहट महसूस करके वो दरवाजे की तरफ बेसुध होकर दौड़ पड़ती है।


आज बहुत देर लगा दी.... (फुसफुसाहट के साथ पूछते हुए वो दरवाजे के सामने खड़ी होती है।)


(सामने दीनानाथ अपनी आर. एन. सिक्योरिटि का टैग लगी पुरानी वर्दी में एक हाथ में राशन की थैली और दूसरे हाथ में एक डब्बा लिए खड़ा था। उसकी आस्तीन बता रही थी की उससे उसने कुछ देर पहले ही मुंह पोछा होगा। उसका एक जूता तो ठीक-ठाक था लेकिन दूसरे जूते से छोटी उंगली को झांकते हुए देखा जा सकता था।)


(दीनानाथ ने थोड़ी मुस्कुराहट भरे स्वर के साथ कुसुम के सामने राशन की थैली के साथ ही एक और डिब्बा आगे करते हुए कहा।) हां, वो जरा जरूरी काम से एक जगह फंस गया था फिर आधे रास्ते में याद आया की ये राशन का सामान भी तो लेना है, तो वो लेने वापस जाना पड़ गया था।


इसी दौरान कुसुम की नजर दीनानाथ की पैंट पर पड़ी, जो घुटने के पास रगड़ कर फट गई थी और जिसके अंदर रक्त-रंजित लाल घुटने बेबस होकर अपने आप को छिपाने की कोशिश कर रहे थे। इनकी ये हालत कहीं ठोकर खा कर गिरने के कारण हुई थी। (कुसुम ने भी थोड़ा संकोच करते हुए पूछ ही लिया) ये घुटने में चोट कैसे लग गई, घाव ज्यादा तो नही...


(कुसुम का ध्यान हटाते हुए दीनानाथ ने बडे ही सहज तरीके से कहा) अरे नही.. नही ये तो बस यू हीं लग गया पिछले चौराहे पर गिर गया था ठोकर लग गई थी पांव में अचानक से तो संभलते संभलते गिर गया। तुम ये सब ले जाओ और जल्दी से कुछ बनाओ, कहां है मेरा टिंकू... आज तो उसे भी भूखा ही रहना पड़ा होगा, बेचारा वो भी अपने को कोसता होगा की किस घर में पैदा हो गया, ना पेट भर खाना है, ना जी भर खिलौना। वैसे उसने मुझसे कुछ दिन पहले एक नया जूता मांगा था। आज मुझे तनख्वाह मिली तो सोचा क्यों ना उसके लिए एक जूता ही ले चलूं। जरा उसे बुलाओ, ये पहन कर देखे कैसा लग रहा, नाप सही है या नही... (दीनानाथ ने डिब्बे से जूता निकालते हुए कुसुम से कहा।)


टिंकू ने सामने आते ही पापा, के हाथों से वो जूता छीनते हुए खुशी से चिल्लाना शुरू कर दिया.. मेले पापा जूता लाए... नया-नया जूता लाए... मेले पापा प्याले पापा...


(उन जूतों ने मानों उसकी भूख को छू-मंतर कर दिया था लेकिन उन जूतों के पीछे की कहानी ना तो टिंकू जानता था ना ही कुसुम, वो तो बस दीनानाथ ही जानता था....)

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